कहा मैंने कितना है गुल का सबात
कली ने यह सुनकर तब्बसुम किया
जिगर ही में एक क़तरा खूं है सरकश
पलक तक गया तो तलातुम किया
किसू वक्त पाते नहीं घर उसे
बहुत 'मीर' ने आप को गम किया
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ख़ुदा महफूज़ रखें आपको तीनों बलाओं से, वकीलों से, हक़ीमों से, हसीनों की निगाहों से। -अकबर इलाहाबादी
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