आज हम बिछड़े हैं तो कितने रंगीले हो गए
मेरी आंखें सुर्ख़, तेरे हाथ पीले हो गए।
कब की पत्थर हो चुकी थीं, मुंतज़िर आंखें मगर
छू के देखा तो मेरे भी हाथ गीले हो गए।
जाने क्या एहसास, साज़े- हुस्न के तारों में है
जिनको छूते ही मेरे नगमे रसीले हो गए।
अब कोई उम्मीद है शाहिद न कोई आरज़ू
आसरे टूटे तो जीने के वसीले हो गए।
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ख़ुदा महफूज़ रखें आपको तीनों बलाओं से, वकीलों से, हक़ीमों से, हसीनों की निगाहों से। -अकबर इलाहाबादी
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आज हम बिछड़े हैं तो
आज हम बिछड़े हैं तो कितने रंगीले हो गए
मेरी आंखें सुर्ख़, तेरे हाथ पीले हो गए।
कब की पत्थर हो चुकी थीं, मुंतज़िर आंखें मगर
छू के देखा तो मेरे भी हाथ गीले हो गए।
जाने क्या एहसास, साज़े- हुस्न के तारों में है
जिनको छूते ही मेरे नगमे रसीले हो गए।
अब कोई उम्मीद है शाहिद न कोई आरज़ू
आसरे टूटे तो जीने के वसीले हो गए।
मेरी आंखें सुर्ख़, तेरे हाथ पीले हो गए।
कब की पत्थर हो चुकी थीं, मुंतज़िर आंखें मगर
छू के देखा तो मेरे भी हाथ गीले हो गए।
जाने क्या एहसास, साज़े- हुस्न के तारों में है
जिनको छूते ही मेरे नगमे रसीले हो गए।
अब कोई उम्मीद है शाहिद न कोई आरज़ू
आसरे टूटे तो जीने के वसीले हो गए।
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