अशआर मेरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं
कुछ शेर फकत उनको सुनाने के लिए हैं
अब ये भी नहीं ठीक के हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं
आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे
ये ख्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं
देखूं तेरे हाथों को तो लगता है, तेरे हाथ
मंदिर में फकत दीप जलाने के लिए हैं
ये इल्म का सौदा, ये रिसालें, ये किताबें
एक शख्स की याद को भुलाने के लिए हैं
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ख़ुदा महफूज़ रखें आपको तीनों बलाओं से, वकीलों से, हक़ीमों से, हसीनों की निगाहों से। -अकबर इलाहाबादी
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जिनका मिलना मुकद्दर मे लिखा नही होता उनसे मुहबत कसम से कमाल की होती है ।।।
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जां निसार अख्तर
अशआर मेरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं
कुछ शेर फकत उनको सुनाने के लिए हैं
अब ये भी नहीं ठीक के हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं
आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे
ये ख्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं
देखूं तेरे हाथों को तो लगता है, तेरे हाथ
मंदिर में फकत दीप जलाने के लिए हैं
ये इल्म का सौदा, ये रिसालें, ये किताबें
एक शख्स की याद को भुलाने के लिए हैं
कुछ शेर फकत उनको सुनाने के लिए हैं
अब ये भी नहीं ठीक के हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं
आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे
ये ख्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं
देखूं तेरे हाथों को तो लगता है, तेरे हाथ
मंदिर में फकत दीप जलाने के लिए हैं
ये इल्म का सौदा, ये रिसालें, ये किताबें
एक शख्स की याद को भुलाने के लिए हैं
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